Monday 19 april 2010 1 19 /04 /Apr /2010 13:58

 

 

 

कल जो मेरे साथ में था, तन्हा-तन्हा वो जाने क्यूँ?
उनके दिल की  ही वो जाने,  अपने दिल की वो जाने क्यूँ?

 

चट्टानों में आग लगी, क्यूँ धुँआ उठा वो जाने क्यूँ?
बुरा वक़्त है, हवा बुरी, अब वो हमको पहचाने क्यूँ?

 

शम्मा बदली, युग भी बदला, न बदले परवाने क्यूँ?

सदियाँ बीत गयीं, सीखे ना अब भी ये दीवाने क्यूँ?

 

दिन के मास, मास के वर्षों, बन जाते न जाने क्यूँ?
कई गुज़र में साथ रहे पर अब भी हम अनजाने क्यूँ?

 

झूठ भी तेरे सच लगते,  तूने इतने गढ़े फ़साने क्यूँ?
सच्चाई से वाकिफ  सब , फिर इतने कहे बहाने क्यूँ?

By ashutosh - Community: Zajbaat - Posted in: ghazals & shayari
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Saturday 20 february 2010 6 20 /02 /Feb /2010 19:32
महान क्रांतिकारी कवी और शायर आशुतोष जी का अवतरण राजस्थान के नागौर जनपद के एक अस्पताल में चैत की अष्टमी संवत २०३७ को माना जाता है . हालाँकि इनकी जन्म तिथि के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं. कुछ विद्वान् इनका जन्म ईसा ३६०० पूर्व भी मानते हैं. लेकिन इनकी प्रमाणिक जन्मतिथि २०३७ ही पायी गयी है. कई ग्रंथो में इनके जन्म दिनांक का उल्लेख मिलता है.
इनकी प्राथमिक सिक्छा उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद में हुई थी . बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के आशुतोष जी का मन स्कूली पढाई में कभी न लगा . एक बार स्कूली दिनों में नक़ल करते हुए भी पकडे गए थे ऐसा उल्लेख समकालीन ग्रंथो में मिलता है . बचपन से घूमने के शौक़ीन कविवर को स्कूली दिनों में ही घूमने का चस्का लग गया था . वो अक्सर घर से स्कूल के बहाने निकल कर समीप के स्टेशन पे बैठ कर आती जाती रेल गाड़ियों को देखा करते थे. ऐसा उल्लेख पुरानी किताबों में मिलता है .
माता पिता के लाख पर्यासों के बाद भी ये कॉलेज से आगे की पढाई न कर सके. किताबी सिक्छा की जगह इन्होने हमेशा व्यावहारिक सिक्छा को प्राथमिकता दी . कॉलेज में कभी भी क्लासों में न पाए जाने वाले कविवर हमेशा कॉलेज समय में बाज़ार में घुमते मिल जाया करते थे . निर्मल स्वभाव के आशुतोष जी को इनके दोस्त हमेशा बहला फुसला के इनसे समोशा आदि खा लिया करते थे . दोस्तों के लिए इनके मन में हमेशा असीम ममता रही. दोस्तों की माँ, बहन, बीवियों को इन्होने हमेशा अपनी माँ, बहन, बीवी समझा और कभी भेद नहीं किया. हमेशा मजदूरों और गरीबों के लिए लड़ने वाले आशुतोष जी ने कई मजदूर आन्दोलनों में बढ चढ़ कर हिस्सा लिया और जेल भी गए. हालाँकि कई आलोचकों का मानना है की ये मजदूर आन्दलोनो में नहीं बल्कि गांजे की तस्करी की वजह से जेल गए और इनके कई पत्रकार मित्र इनकी गिरफ्तारी को अखवारों में मजदूर अन्दलानो से जोड़ देते थे. अपनी जवानी के दिनों में इनके कई महिलायों से अन्तरंग प्रेम प्रसंग भी चर्चित हुए लेकिन अपनी जीवनी "चूतिया का चक्कर" में इन्होने उसका खंडन करते हुए लिखा है की वो सिर्फ उनकी अच्छी मित्र थी और कुछ नहीं .
कई इतिहासकार इनपे शराबखोरी का इलज़ाम भी लगाते हैं. बताते हैं ये कई बार नशे में बेशुध नालियों में पायें गए हैं. अपने दोस्तों में ये पैगचोर के नाम से मशहूर थे. खैर विवादों से तो हर महान शख्सियत को दो चार होना पड़ा है . वैसे एक दो अपवादों के अलावा इन्होने हमेशा मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ी. जिसकी वजह से इनपे कई झूठे और गलत आरोप भी लगे. ऐसा उल्लेख मिलता है की ये मजदूरों की गाडी कमाई का एक बड़ा हिस्सा चिटफंड के जरिये धोखाधडी से खा गए. लेकिन पुलिस जांच में हमेशा दूध का दूध मिला और कभी कुछ साबित न हो सका .
आशुतोष जी ने हमेशा हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए काम किया. संवत ३०४३ में इनके प्राण ह्रदय घात की वजह आकाश कुसुम हो गए. लेकिन कुछ विद्वानों ने अब प्रमाणित कर दिया की ज्यादा शराब की वजह से इनके गुर्दे फेल हो गए थे .
हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक आशुतोष जी की मृत्यु के बाद इनके हिन्दू मुस्लिम अनुयायी इस बात पे लड़ गए की इन्हें जलाया जाए की दफनाया जाए . लेकिन बताते हैं इनकी मृत्युशय्या के उपर पड़ी चादर जब हटाई गई तो इनके शरीर की जगह देसी दारु के पौवे मिले. जिन्हें हिन्दू मुस्लिम ने मिल बाँट के पिया.

By ashutosh - Community: Zajbaat - Posted in: ghazals & shayari
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Tuesday 16 february 2010 2 16 /02 /Feb /2010 07:40
ख़ुल के जियो भुला के अपराधबोध
खुद को बेहतर बना लो कल के लिए
सुबह फिर एक अपनी करो
शाम फिर एक अपनी लिखो
इंसान ही करता है गलती एक
सज़ा उम्र भर दो खुद को उसकी
ये तकाज़ा नहीं
रखो अपनी बात कहो अपनी बात
जीत लो भरोसा जो खोया है तुमने
खुद का भी, उस का भी
जो देता है तुम्हे प्रकाश
अब जी लो खुल के फिर
अपनों के साथ
सपनों के साथ
By ashutosh - Community: Zajbaat - Posted in: ghazals & shayari
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Sunday 14 february 2010 7 14 /02 /Feb /2010 04:47

 

 

पिता  बनने  का  सुख  महसूस  किया  मैंने
अब  बिलकुल  अपने  पिता  की  तरह  लगता  हूँ  मैं
नौ  महीने  एक  एक  दिन
एक  माँ  की  तरह  महसूस  किया  मैंने
रोज  इंतज़ार  किया  बेचैनी  से
जैसे  प्रेयसी  वादा  कर  के  गयी  हो
कुछ  भी  हो 
मैं  जरूर  आयूँगी
वादे  की  पक्की  वो  प्रेयसी
आई  हो  जैसे  सब  से  झगड़  के
मेरे  पास  सिर्फ  मेरे  लिए 

By ashutosh - Community: Zajbaat - Posted in: ghazals & shayari
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Saturday 23 january 2010 6 23 /01 /Jan /2010 13:33

                           
                   

साँसों से घुटती ज़िन्दगी
हर रोज मर रही थी पल पल
मौत की दुआ मांगते लोग
तन्हा अकेले हर पल
मौत से बचना नामुमकिन
बस आसान होगी या मुश्किल
यही है दुविधा

बोझ हर घड़ी
सपनो का , अपनों का
गरीबी मानती नहीं किसी के अरमान
देखती नहीं मजबूरी
मनमानी करती है हमेशा
बच्चे-पढ़ाई,
बाप-इलाज़,बीवी-कपड़े
बनिया-राशन
तालमेल ही नहीं बिठा पाया
आसान बचपन के ख्वाब,
मुश्किल में पड़ें हुए हैं आज
रोज टूट जाता है एक

क़र्ज़ भगवान है दिवाली, होली का
पूड़ी सब्जी कैसे बनाये, बिना घी के
बनिया दे देता है उधार

माथे पे लकीरें पड़ गयीं सोच सोच के
कभी क़र्ज़ मुक्ति होगी या नहीं

आज सुकून मिला है
ज़िन्दगी कभी भी जी न सके
मर तो सकते हैं खुल के

Saanso se ghut ti zindagi 
har roz mar rahi thi pal pal
maut ki dua maangte log  
tanha akele har pal
maut se bachna naamumkin
bus aasaan hogi ya mushkil
yahi hai duvidha

bojh har ghadi
sapno ka, apno ka
gareebi maanti nahi kisi ke armaan
dekhti nahi majboori
manmaani karti hai hamesha
bachche-padaai
baap-ilaaz, biwi-kapde
baniya-raashan
taalmel hi nahi bitha paaya
aasaan bachpan ke khwab,
aaj mushkil me pade huye hain
roz toot jaata hai ek

karz bhagwaan hai diwali, holi ka
poodi sabzi kaise banaye, bina ghee ke
baniya de deta hai udhaar

maathe pe lakeeren pad gayin soch soch ke
kabhi karz mukti milegi ya nahi

aaj sukoon mila hai,
zindagi kabhi bhi ji na sake
mar toh sakte hain khul ke

By ashutosh - Community: Zajbaat - Posted in: ghazals & shayari
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  • : Ishq, muhabbat, pyaar or jindagi se jaddozehed ki tasveer, jo dil ko dikhaai di, duniya ko dkhaai hamne, khata hui, agar pyaar kiya tumse, toh saza bhi paayi humne
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