Thursday 31 december 2009
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10:26
नूतन वर्ष का मेरा नूतन ख्वाब
मैं देखना चाहूँगा नए साल में
सबके सपने पूरे होते
जैसे मेरे हुये
मैं चाहूँगा हर भूख को रोटी मिले रोज़
मेरे हर भाई को काम मिले
जिसे मैं जानता हूँ
और जिसे मैं नहीं जानता उसे भी
किसी की बेटी अगवा ना हो पूरे साल
शराब पी के
कपड़े ना फाड़े कोई किसी सैलानी के
हम सभ्य बने पर्यटकों के लिए
हम हिफाजत करना सीखे खुद की
और समाज की भी
हर दिल में प्यार हो किसी के लिए
कोई फरेब कोई धोखा कोई चोरी ना हो
सबको मुहब्बत मिले अपनी
अमन हो चैन हो शान्ति हो हर शहर में
पडोसी से झगड़ा ना हो मोहल्ले में
हम बाज़ार जाएँ घूमने शाम को
और बम न फटे .
हो जायेगा न्यू इयर हैप्पी.
HAPPY NEW YEAR 2010
By ashutosh
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Friday 25 december 2009
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11:57
अब हाल उनका मालूम पड़ता है अखबारों से
हमने दर्द को रिसते देखा है दरारों से
छतों को उखाड़ के ले गए घरों की हमारी
हमने बरसात गुजारी है इन दीवारों से
शहर छोड़ देते हम भी ओरों की तरह
नाव बढ़ न सकी आगे कनारों से
किसी किताब में नहीं सजा उनके पापों की
इंसानियत तौलते हैं जो शब्द के औजारों से
ऊँची कीमत में बिक गया शहर सारा
ज़िन्दगी कैसे बचाएं मौत के खरीदारों से
किसे दिलाये यकीन हम अजीब हाल पे अपने
खतरा हमको है घर के असरदारों से
By ashutosh
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Thursday 24 december 2009
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10:46
खामोश जिस्म में भी जान अभी बाकी है
तेरी वफाओं का निशान अभी बाकी है
थम गयी दिल में हरारत जो तेरे दम से थी
बुझे से दिल में भी अरमान अभी बाकी है
हिल गया मेरा आशियाना इन थपेड़ो से
आने वाला बड़ा तूफ़ान अभी बाकी है
मिट गया सब जो मुहब्बत में था पाया मैंने
फिर भी कई और इम्तिहान अभी बाकी है
हर सज़ा रूबरू पायी है उस सितमगर से
क़त्ल को मेरा पर फ़रमान अभी बाकी है
हर तरफ ज़ख्म ही पाए हैं जीते जी हमने
फिर भी होठों पे ये मुस्कान अभी बाकी है
By ashutosh
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Monday 14 december 2009
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11:23
सर्दी में पुरानी पुलिया के नीचे
जो फ़कीर रहता था मर गया आज
लोग आ रहें हैं
जा रहें हैं
भीड़ जमा है पुलिया पे
गुजरते हुये देख लेते हैं लोग
झाँक कर एक पल नीचे
कोतुहल होता है देखने का
पर रुकने का मन नहीं
अजनबी नहीं है फ़कीर
यही रहता था पुलिया के नीचे
रोज
यही सोता था
बात भी करता था सब से
लोग भी अजनबी नहीं हैं
जानते हैं सब उसे
रोज गुजरते हैं यही से
देखा करते थे उसे बातें करते खुद से
अब किसे देखेंगे
कोई फर्क नहीं पड़ता
सब जल्दी में हैं
चले जा रहें हैं दौड़े
कोई दुःख नहीं कोई दर्द नहीं
एक पल न सोचा रात भर ठिठुरा होगा
सर्दी में
कितनी तकलीफ में मरा होगा
आसान नहीं होता सर्दी से मरना
फ़कीर नहीं मरा इंसानियत मर गयी .
By ashutosh
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Saturday 12 december 2009
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10:48
कल की रात सबसे हसीन रात थी
उसने चूमा मेरे गुलाबी होठों को
एक एहसास एक ज़ुम्बिश
रोम रोम में सिहरन
और वो घबराहट भी
पता नहीं कैसी
मैं अन्दर से अभिभूत थी
और एक अनजाना डर भी
पता नहीं क्या था वो
जो असीम आकाश में ले जा रहा था मुझे
पर मेरे पैर जमीं पर ही थे
शायद प्रथ्वी के गुरुत्वाकर्षण ने रोक रखा था मुझे
नहीं तो खो जाती अनन्त अंतरिक्ष में
मन ना था आने का वापस
रुक जाना चाहती थी
उन पलों में
सदा के लिए
सर्दी में वर्फ थी मैं
या तप रही थी झुलसती गर्मी में
होश ना था
या मदहोश थी
पता नहीं
सदियों की तृप्ति
आज चाँद मिल गया था जिद्दी बालक को
रोमांच कुछ पल के लिए अपने चरम पे
हवा थमी सी बस दिल धड़क रहा था
जैसे आज बाहर आना चाहता हो
शुक्रिया कहने मुझे
पर मैं कहा कुछ सुन पा रही थी
अदभुत था
वो मेरा पहला चुम्बन
By ashutosh
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