Monday 25 october 2010 1 25 /10 /Oct /2010 14:09

किसी पर्वत से भिड़ जाने की, बादल बन के उड़ जाने की
सूरज संग पेंच लड़ाने की मेरी अभिलाषा बाकी है.

 

सपने जिंदा हैं मरें नहीं, अरमां अभी पूरे करे नहीं
ऊँचे अभी पेंग बढ़ाने की मेरी अभिलाषा बाकी है.

 

सौ मील चला और सिफ़र रहा, पर तेज़ हवा में निडर रहा.
अभी आंधी से टकराने की मेरी अभिलाषा बाकी है.

 

कितना भी बिकट सितम होगा हौसला कभी न कम होगा
तकदीरों से लड़ जाने की मेरी अभिलाषा बाकी है.

By ashutosh - Community: Zajbaat - Posted in: ghazals & shayari
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Friday 6 august 2010 5 06 /08 /Aug /2010 11:59

मेरे होने न होने का वजूद नहीं है.
क्यूँ ऐसे हालात पैदा हुए हैं?
क्यों मेरा फलसफा सिर्फ मेरा है?
ऐसा तो नहीं था मैं और ना ही तुम.
मैं अकेला जी रहा हूँ और तुम भी.
मेरा समाज मर चुका है.
और तुम्हारा भी.
ज़िन्दगी के रंग काले पड़ गए.
विधवा सा जीवन जी रहा हूँ मैं.
और तुम भी.
क़ैद एक दायरे में.
यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ.
बस इतनी सी दुनिया है क्या?
शायद इतनी ही होगी?
मेरी भी और तुम्हारी भी.
मुझे खा जाएगी तन्हाई.
और तुम्हे भी.

By ashutosh - Community: Zajbaat - Posted in: ghazals & shayari
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Thursday 5 august 2010 4 05 /08 /Aug /2010 13:40

कविता अधूरी है प्यार की.
मेरी ज़िन्दगी की तरह.
तुम आ जायो प्रिये.
मुझे गीत लिखना है .
मेरे प्यार का.
मुझे दर्द बताना है.
मेरे दिल का.
तुम घुल चुके हो.
मेरी साँसों में.
जैसे शकर घुलती है.
पानी में.
पर तुम्हे एहसास नहीं है.
मुझे है.
आ जायो मेरे करीब.
मुझे कविता पूरी करनी है.
मुझे प्यार पूरा करना है.

By ashutosh - Community: Zajbaat - Posted in: ghazals & shayari
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Tuesday 11 may 2010 2 11 /05 /May /2010 13:01

प्रिये,

मुझे अकेला छोड़ दो
प्रतिकूल समय और परिस्तिथियों में,
मुझे अकेला छोड़ दो.
इसे तुम स्वार्थ कहो या मेरा अभिमान,
या मुझे कुछ और नाम दो, जो तुम्हे सूझता हो,
और मुझे अकेला छोड़ दो.
वक़्त जो मेरा है और बेहतर नहीं है,
उसे अपना ही रखूँगा
और सिर्फ अपना.
तुम्हारा कोई हक नहीं उसपे
इसलिए मुझे अकेला छोड़ दो.
तन्हाई मुझे ताक़त देगी,
फिर से खुद को समेटने,
जुड़ने और उठ खड़ा होने की
इसलिए मुझे अकेला छोड़ दो.
डरो मत चिंता भी मत करो,
ऐसे हालात ले के कुछ नहीं जाते,
सिर्फ दे जाते हैं,
और बेहतर जीने का तरीका
और

सुधार का एक और मौक़ा
इसलिए मुझे अकेला छोड़ दो.

By ashutosh - Community: Zajbaat - Posted in: ghazals & shayari
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Monday 19 april 2010 1 19 /04 /Apr /2010 13:58

 

 

 

कल जो मेरे साथ में था, तन्हा-तन्हा वो जाने क्यूँ?
उनके दिल की  ही वो जाने,  अपने दिल की वो जाने क्यूँ?

 

चट्टानों में आग लगी, क्यूँ धुँआ उठा वो जाने क्यूँ?
बुरा वक़्त है, हवा बुरी, अब वो हमको पहचाने क्यूँ?

 

शम्मा बदली, युग भी बदला, न बदले परवाने क्यूँ?

सदियाँ बीत गयीं, सीखे ना अब भी ये दीवाने क्यूँ?

 

दिन के मास, मास के वर्षों, बन जाते न जाने क्यूँ?
कई गुज़र में साथ रहे पर अब भी हम अनजाने क्यूँ?

 

झूठ भी तेरे सच लगते,  तूने इतने गढ़े फ़साने क्यूँ?
सच्चाई से वाकिफ  सब , फिर इतने कहे बहाने क्यूँ?

By ashutosh - Community: Zajbaat - Posted in: ghazals & shayari
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  • : dard armaan jindagi muhabbat Poetry
  • : Ishq, muhabbat, pyaar or jindagi se jaddozehed ki tasveer, jo dil ko dikhaai di, duniya ko dkhaai hamne, khata hui, agar pyaar kiya tumse, toh saza bhi paayi humne
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